पाकिस्तान-फिर धधका खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान-फिर धधका खैबर पख्तूनख्वा
पाकिस्तान-फिर धधका खैबर पख्तूनख्वा
   दिनांक 24-अप्रैल-2018
अगर वर्तमान घटनाक्रम कोई संकेत है तो पाकिस्तान में राजनीतिक-सामाजिक उथल-पुथल बढ़ने वाली है। सेना और आतंक के गठजोड़ को सत्ता के आधार-स्तंभ के रूप में अघोषित मान्यता दिलाने वाले मियां मुशर्रफ की एक और करतूत सामने आई है। पाकिस्तान में लापता लोगों की खोजबीन कर रहे आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि मुशर्रफ के शासनकाल में 4,000 पाकिस्तानियों को पैसे के लिए विदेशियों को सौंप दिया गया। मुशर्रफ पर लगे इन आरोपों से कुछ और हो या न हो, लापता लोगों के मुद्दे पर राजनीतिक और सैनिक सत्ता के खिलाफ जनाक्रोश का भड़कना तय है। इसका असर यह होगा कि खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान से आजादी के लिए संघर्ष तेज होगा, जिसकी आंच सिंध से बलूचिस्तान तक महसूस की जाएगी।

 
 
पाकिस्तान में लापता लोगों की जांच-पड़ताल के लिए पाकिस्तान ने आयोग बनाया है। इसके अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश जावेद इकबाल हैं, जो राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो के भी अध्यक्ष हैं। उन्होंने हाल ही में मानवाधिकार से संबद्ध पाकिस्तान की संसदीय समिति के समक्ष कहा कि मुशर्रफ के शासनकाल के दौरान 4,000 से अधिक पाकिस्तानी विदेशियों को सौंप दिए गए। जावेद ने कहा, ‘‘मुशर्रफ और उनकी सरकार के लोगों को इसके बदले डॉलर में भुगतान हुआ।’’ बेशक जावेद ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका स्पष्ट इशारा अमेरिका की ओर था। वे कहते हैं कि मुशर्रफ सरकार में गृहमंत्री आफताब अहमद खान शेरपाओ भली-भांति इस लेन-देन के बारे में जानते थे। खुद मुशर्रफ ने भी स्वीकारा था कि उन्होंने आतंक में शामिल कुछ लोगों को अमेरिका को सौंपा है। जावेद कहते हैं, ‘‘तब संसद ने भी उनसे यह पूछने की कोशिश नहीं की कि आखिर किस कानून के तहत ये लोग विदेशियों को सौंपे गए? क्योंकि पाकिस्तान में तो ऐसा कोई कानून ही नहीं।’’ जावेद ने यह भी कहा कि जितने भी लोग लापता हैं, उनमें से 70 प्रतिशत उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े थे। जो चंद लोग लौटकर आए, वे इतने भयाक्रांत थे कि यह बोलने का साहस नहीं जुटा पाए कि उनके साथ क्या हुआ।
 
तेज होगी आजादी की आवाज
 
लोगों के लापता होने में सत्ता और सेना के हाथ होने का मामला ऐसा है, जिसे खैबर पख्तूनख्वा, सिंध और बलूचिस्तान के लोगों ने अपने अनुभवों से जाना है। उन्होंने देखा है कि प्रशासन और सेना लोगों को उठाकर ले गई और उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला। आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का सबसे अधिक खामियाजा खैबर पख्तूनख्वा ने भुगता है, जहां बेकसूर लोगों को उठाए जाने के खिलाफ लोग उबल पड़े हैं। पूर्व राजनयिक योगेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘सबसे पहली बात तो यह है कि लोगों को गायब कर देने में सेना का हाथ रहा है, इसलिए इसकी पड़ताल कर रहे आयोग के सामने तथ्यों को रखना अपने आप में आसान नहीं। दूसरी बात, खुद इसके अध्यक्ष मान रहे हैं कि लापता लोगों में 70 फीसदी उग्रवादी गतिविधियों में लिप्त थे। यानी 30 फीसदी बेकसूर थे। अगर इतनी बड़ी संख्या में बेकसूर लोग शिकार बनेंगे तो कोई समाज भला कैसे स्थिर हो सकता है? उसमें अलगाव की जड़ें तो गहरी होती जाएंगी। इसलिए आने वाले समय में खैबर पख्तूनख्वा में विद्रोह की आवाज और तेज होगी, इसमें कोई शक नहीं।’’

 
 
खैबर पख्तूनख्वा के लोगों का सब्र अब जवाब दे गया है और इसकी झलक पाकिस्तान से आजादी की मांग के साथ सत्ताविरोधी प्रदर्शनों में लोगों की बढ़ती संख्या में देखी जा सकती है। अप्रैल के शुरू में पेशावर में पख्तूनों ने ‘लापता’ लोगों की खोजबीन की मांग के साथ जबर्दस्त प्रदर्शन किया। इसमें एक लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। ये लोग पाकिस्तान से आजादी की मांग कर रहे थे। साथ ही, वे मुशर्रफ को सरेआम फांसी चढ़ाने की भी मांग कर रहे थे। इन लोगों ने संघ प्रशासित जनजातीय क्षेत्र (फाटा), वजीरिस्तान आदि में पख्तूनों के खिलाफ हो रहे जुल्म की अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जांच कराने की मांग की। तीन घंटे की इस रैली का आयोजन पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) ने किया था। इस रैली में ऐसे हजारों लोग शामिल थे, जिनके संबंधियों को सेना और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अगवा किया और उसके बाद उनका कोई सुराग नहीं मिला।
 
वैसे तो, पाकिस्तान में राजनीतिक सत्ता, सैन्य सत्ता और आतंकवादियों की तिकड़ी काफी पहले से काम कर रही है, लेकिन मुशर्रफ शासन के दौरान यह गठजोड़ कुछ ज्यादा ही कुख्यात हो गया। लोगों को लगता है कि मुशर्रफ शासन के दौरान दिखी सत्ता की जनविरोधी प्रवृत्ति आगे भी बनीं रही और सरकारों ने लोगों को लापता कर देने की नीति अपनी ली गई। इसी साल जनवरी में भी वजीरिस्तान के सैकड़ों लोगों ने इस्लामाबाद तक पैदल मार्च निकाला और समान अधिकार तथा लापता लोगों की जानकारी पाने की मांग करते हुए पाकिस्तान से आजादी के नारे लगाए।
 
खैबर पख्तूनख्वा से उठी यह आवाज आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तानी कार्रवाई के विरोध में नहीं है। दरअसल, ये प्रदर्शनकारी आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की पाकिस्तान की पोल खोल रहे हैं। इनका कहना है कि पाकिस्तान ने फाटा समेत सीमांत इलाकों में आतंकवाद के खिलाफ एक छद्म युद्ध छेड़ रखा है। इस्लामाबाद में प्रदर्शन के दौरान भी खैबर पख्तूनख्वा के लोगों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई को कमजोर कर रहा है और इसके लिए वह आतंकवादियों का मनचाह इस्तेमाल कर रहा है। योगेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘अफगानिस्तान सीमा पर जिस तरह की कार्रवाई हो रही थी, उसका काफी-कुछ अंदाजा अमेरिका को भी था। जब सारे बड़े आतंकवादी अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाएं तो स्थिति अपने आप स्पष्ट हो जाती है। दरअसल, पाकिस्तान चाहता है कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर बेकसूर लोगों को शिकार बनाने से भड़के जनाक्रोश को अमेरिकी दबाव के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए।’’ ‘लापता’ लोगों के खिलाफ सिंध और बलूचिस्तान में भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। आने वाले समय में विरोध के स्वर और मुखर होंगे।
 
लापता लोगों की संख्या कहीं अधिक
 
संसदीय समिति के सामने जावेद इकबाल ने बताया कि फरवरी 2011 से मार्च 2018 के बीच आयोग ने 3,219 मामलों को हल किया, जबकि 1,710 की जांच चल रही है और पिछले चंद वर्षों के दौरान 368 मामले संयुक्त राष्ट्र ने आयोग के पास भेजे। लेकिन लापता होने के वास्तविक मामले इससे कहीं अधिक हैं। ‘वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स’ बलूचिस्तान में लापता लोगों की खोजबीन से जुड़ी एक संस्था है, जिसके अध्यक्ष नसीरुल्लाह बलोच ने कई मौकों पर न्यायिक आयोग की भूमिका पर ही सवाल उठाए हैं। उनके इस आरोप में दम भी दिखता है। पश्तून प्रोटेक्शन मूवमेंट के नेता मंजूर पश्तीन ने हाल ही में बताया कि न्यायिक आयोग के सदस्य पीड़ितों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जिससे वे शिकायत लेकर ही न आएं। उन्होंने एक पश्तून महिला के हवाले से कहा कि जब उसने अपने लापता पति के बारे में आयोग के पास शिकायत की तो आयोग के एक सदस्य ने कहा, ‘‘आप शौहर को भला क्यों खोज रही हैं?...आप खूबसूरत हैं.. और मैं आपकी खिदमत में हाजिर हूं।’’ आयोग के सदस्य के ऐसे व्यवहार का नतीजा यह हुआ कि उस महिला ने सुनवाई में जाना छोड़ दिया। इस तरह के तमाम उदाहरण हैं जो यह बताने के लिए काफी हैं कि लापता लोगों के बारे में जो आंकड़े आ रहे हैं, वे हकीकत में काफी कम हैं। इसलिए यह जितनी बड़ी समस्या दिखती है, हकीकत में उससे कहीं बड़ी है।
 
ठोस कार्रवाई की मजबूरी
 
कहते हैं काठ की हाड़ी बार-बार आंच पर नहीं चढ़ती। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में ऐसा ही हो रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका की पाकिस्तान के प्रति पेशबंदी आक्रामक हो गई है। उसने यह सब समझते हुए भी न समझने या आधा समझने का दिखावा छोड़ दिया है। इसीलिए पाकिस्तान के सामने आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाने की मजबूरी हो गई है। इसी का नतीजा है कि हाफिज सईद के सियासी सफर को शुरू होने से पहले ही रोक दिया गया और तमाम संगठनों की वित्तीय धमनियों पर रोग लगा दी गई।
 
राजनीतिक उठापटक
 
पाकिस्तान में पीएमएल-एन सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला है और इसलिए वहां कार्यवाहक सरकार तय करने की कोशिशें की जा रही हैं, जिसकी देखरेख में आम चुनाव होंगे। पहली जून तक संसद और राज्य विधानसभाओं को भंग किया जाना है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की कोशिशें हो रही हैं। लेकिन यह तो एक छोटा सा मुद्दा है। चुनाव होना है, हो जाएगा। अभी बड़ा मुद्दा वहां बनते-बिगड़ते सियासी समीकरण हैं। नवाज शरीफ के बाद उनकी पार्टी में टूट-फूट मची हुई है। कुछ दूसरी पार्टी का दामन थाम रहे हैं तो कुछ अकेले चुनाव लड़ने का दम भर रहे हैं।
 
इसी बीच मुशर्रफ के बारे में यह बड़ा और सनसनीखेज खुलासा हो गया है। ऐसे में पहले से ही पाकिस्तान आने से कतरा रहे मुशर्रफ के लिए वतन लौटना और भी मुश्किल हो जाएगा। इन सब में पूर्व क्रिकेटर इमरान खान को अपने लिए संभावनाएं दिखने लगी हैं। उन्हें पता है कि पाकिस्तान में सत्ता पानी है तो सेना का भरोसा जीतना होगा। इसीलिए वह सेना के पक्ष में बयानबाजी कर रहे हैं। बहरहाल, पाकिस्तान में सरकार जिसकी भी बने, इतना तय है कि सेना की परोक्ष भूमिका तो रहेगी ही। इसलिए इस चुनाव को सत्ता में बैठे चेहरों में बदलाव की वैसी प्रक्रिया के तौर पर देखना उचित होगा, जिसमें आतंकवाद को लेकर उसकी नीतियां वही रहेंगी- डंडे का डर हो तो कदम बढ़ेंगे, न हो तो ठिठक जाएंगे।