धर्मों में दिखावटी समानता नहीं थोप सकते
   दिनांक 30-अप्रैल-2018
अमीश त्रिपाठी के भारतीय पौराणिक आख्यानों पर आधारित उपन्यासों की युवाओं में सबसे ज्यादा दीवानगी है। वे अपनी कल्पना व यथार्थ जगत से तालमेल बिठाते हुए लिखते हैं और शिवात्रयी के बाद अब रामचंद्र श्रृंखला की तीसरी पुस्तक पर काम कर रहे हैं। अजय विद्युत से बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि हमें विभिन्न धर्मों में समानता तलाशने की नादानी से बचना चाहिए।
 
 
मनुष्य एक है। धर्म एक है। ऐसा कहा जाता है। तो फिर विभिन्न धर्मों में एकता की कोशिश सिरे क्यों नहीं चढ़ पाती? धर्म के नाम पर ही सबसे ज्यादा हिंसा और अलगाव है ?
 
धर्म 'असमान' होते हैं... और यह चिंता की बात नहीं होनी चाहिए। शायद इसी में अनेक अंतरधार्मिक संवादों की समस्या निहित है। असमानताओं से असहजता होती है। अक्सर यह साबित करने की हताशा भरी कोशिशें देखी जाती हैं कि 'हम सब समान हैं।' मैं मानव शरीर के माध्यम से अपना नजरिया रखने की कोशिश करता हूं। हमारी शारीरिक संरचना का प्रारंभिक स्रोत समान है। किस मायने में? हम सभी समान रसायनों से, समान अनुपात में बने कार्बन आधारित जीव रूप हैं, जिनमें जल प्राथमिक अवयवों में से एक है। तो आपने देखा कि स्रोत समान है। और जब हम मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो क्षय की अवधि के बाद हमारे शरीर उन्हीं रसायनों में मिल जाते हैं जिनसे हम बने थे। तो एक तरह से, प्रत्येक इंसानी शरीर का 'स्रोत' और 'मंजिल' समान है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि हमारे भौतिक स्वरूप आज भी बिल्कुल समान हैं? नहीं। कुछ लंबे हैं, कुछ छोटे हैं। कुछ मोटे हैं, कुछ पतले हैं। कुछ गोरे हैं तो दूसरे श्याम हैं। हमारी उत्पत्ति समान मूल से हुई है, और अंत भी एक सा ही होगा, मगर आज हम भिन्न बने रहते हैं। हम दिखावटी समानता नहीं थोप सकते।
 
यह तो हमारे भौतिक शरीर की बात हुई... लेकिन आत्माएं तो हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी नहीं होती हैं?
 
यही बात आत्मा के साथ है। स्रोत समान हो सकता है। अंत भी समान हो सकता है। क्योंकि आरंभ और अंत दोनों ईश्वर के साथ होता है। लेकिन जैसे हम आज हैं, हम आध्यात्मिक तौर पर भिन्न हैं। धर्म और आध्यात्मिकता का लक्ष्य आत्मा की यात्रा में सहायता करना होता है। चूंकि हम आज भिन्न हैं तो हमारी यात्राएं भी भिन्न होंगी। कुछ आत्माएं हिंदू धर्म के मार्ग को प्रेरणादायक पा सकती हैं, कुछ इस्लाम को, कुछ ईसाई धर्म को, कुछ बौद्ध धर्म को, कुछ सिख पंथ या अन्य किसी मत को। कुछ नास्तिकतावाद से भी प्रेरित हा सकती हैं। कोई हर्ज नहीं है। हमें उस मार्ग पर चलना चाहिए जो हमारी आत्मा के लिए अनुकूल हो।
 
हमें समझना चाहिए कि हमारे मार्ग भिन्न होंगे। सभी एक ही मार्ग पर नहीं चल सकते, न ही एक ही धर्म का या तथाकथित 'शाश्वत मूल्यों' तक का पालन कर सकते हैं। नतीजतन, हमें एक-दूसरे के मार्गों का मूल्यांकन करने से, या जबरदस्ती उन समानताओं को ढूंढने से बचना चाहिए जो होती ही नहीं हैं। हमें भिन्नताओं का सम्मान करना सीखना होगा। यह कोई प्रतियोगिता नहीं है। हमें दूसरे धर्मों को केवल बर्दाश्त' ही नहीं करना चाहिए, उनका सम्मान भी करना चाहिए। मैं आपके मार्ग का सम्मान करता हूं और आप मेरे मार्ग का सम्मान करें (मगर जरूरी बात यह है: सम्मान दोनों ओर से होना चाहिए, किसी एक ओर से नहीं)।