बर्बादी की राह पर पाकिस्तान!
   दिनांक 14-मई-2018

 

 1971 के युद्ध में हार के बाद पाकिस्तानी फौज को करीब 93,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण करना पड़ा था। दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते पाकिस्तानी फौज के कमांडर ले. जनरल ए.ए.के

1971 के युद्ध में हार के बाद पाकिस्तानी फौज को करीब 93,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण करना पड़ा था। दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते पाकिस्तानी फौज के कमांडर

 
पाकिस्तान सरकार की प्राथमिकता अपने नागरिकों को रोटी, कपड़ा और मकान देने की नहीं है। भारत से चिढ़ने उसकी आधारभूत प्राथमिकताएं तब बदल डाली हैं। बौखलाए इस्लामी मुल्क ने अपने रक्षा बजट में तगड़ा इजाफा किया है। दरअसल, अमेरिकी मदद रुकने के बाद पाकिस्तान में भारत की बढ़ती ताकत को लेकर काफी बेचैनी है। इसी से घबराकर उसने 2018-19 के अपने बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 9.6 अरब डॉलर रखे हैं। पिछले साल के रक्षा बजट से यह करीब 20 प्रतिशत अधिक है। जाहिर है, इतनी भारी-भरकम रकम हथियारों की खरीद और सैन्य उन्नयन पर ही खर्च होगी।
 
भारत से बराबरी का रोग
 
पाकिस्तान को हमेशा भारत से तुलना करने का रोग सताता है। वह भारत से क्षेत्रफल, आबादी और अर्थव्यवस्था के मामलों में दशकों पीछे है। इसके बावजूद भारत से मुकाबला करने के चक्कर में अपनी जनता के बारे में भी सोचने के लिए तैयार नहीं है। वहीं, भारत को अपना रक्षा बजट इसलिए बढ़ाना पड़ता है, क्योंकि उसे भीमकाय चीन की अदम्य होती विस्तारवादी चाहतों को देखना और क्षेत्रीय संतुलन के कारकों को ध्यान रखना होता है। पर यह बात पाकिस्तान पर लागू नहीं होती और यह बात पाकिस्तानी नेतृत्व के पल्ले भी नहीं पड़ती। हकीकत यह है कि पाकिस्तान में संसदीय तरीके से चुनी हुई सरकारें भी सेना के इशारों पर चलती हैं। उनकी अपनी कोई हैसियत नहीं होती। पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व हर जगह दिखता है।
 
शुरुआत अयूब खान से
 
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़े जनरल अयूब खान ने पाकिस्तान की सेना में भारत विरोध की जड़ें मजबूत कीं। पाकिस्तान की सेना में पंजाबियों का वर्चस्व स्पष्ट है। फौज में पंजाबियों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से ज्यादा है, जो भारत से नफरत करते हैं। इस भावना के मूल में पंजाब में देश के विभाजन के समय हुए खून-खराबे को देखा जा सकता है। पाकिस्तान का पंजाब सूबा इस्लामी कट्टरपंथ की प्रयोगशाला है, जहां हर इनसान खुद को दूसरे से बड़ा कट्टर मुसलमान साबित करने की होड़ में लगा रहता है। पंजाब के अलावा, पाकिस्तान के बाकी भागों में भारत विरोधी माहौल उतना अधिक नहीं है। पाकिस्तानी फौज ने खून-खराबा करने में अपने लोगों को भी नहीं बख्शा है। हो सकता है कि इस पीढ़ी को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के युद्ध में पाकिस्तानी फौज की भूमिका के बारे में पर्याप्त जानकारी न हो।
 
पाकिस्तान की सेना ने 1969-71 में अपने ही मुल्क के बंगालीभाषी लोगों पर जुल्म का सिलसिला शुरू किया। इस कार्रवाई को सेना ने ऑपरेशन सर्च लाइट नाम दिया। यह जुल्म ऐसा-वैसा नहीं था। इसमें लाखों लोगों की बेरहमी से हत्या, हजारों युवतियों से सरेआम बलात्कार और तरह-तरह की अमानवीय यातनाएं शामिल थीं। पाकिस्तानी सेना की इस दमनात्मक कार्रवाई में 30 लाख लोग मारे गए। इतना ही नहीं, फौजी दरिंदों ने दो लाख महिलाओं से बलात्कार किया था। पाकिस्तानी सेना अपने आप में किसी माफिया गिरोह से कम नहीं है। माना जा रहा था कि 1971 में भारत के विरुद्ध युद्ध में धूल चाटने के बाद पाकिस्तान की सेना सुधर जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान की सेना ने देश में चार बार निर्वाचित सरकारों का तख्ता पलटा।
 
जनरल अयूब खान, याह्या खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तानी सेना को एक माफिया के रूप में विकसित किया और निर्वाचित सरकारों को कभी कायदे से काम करने का मौका ही नहीं दिया। जम्हूरियत की जड़ें जमने नहीं दीं। आलम यह था कि 1956 तक पाकिस्तान का संविधान तक नहीं बन सका। बाद में संविधान बन भी गया तो चुनाव नहीं हो सके और सेना ने सत्ता हथिया ली। दरअसल, शुरू से ही पाकिस्तानी सेना का मकसद नफरत फैलाकर भय का माहौल पैदा करना रहा है। 1947 के बाद से पाकिस्तान में करीब 30 साल तक सैन्य शासन रहा। सेना ने सत्ता के केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया। जब सेना का शासन नहीं रहा तब भी इस केंद्रीकरण का प्रभाव बना रहा। अयूब खान और जिया-उल-हक के सैन्य शासन के दौरान भी लोकतंत्र बहाली के लिए प्रदर्शन और आंदोलन हुए, पर सेना का कब्जा बना रहा।
 
भारत विरोधी सेना प्रमुख
 
पाकिस्तान का सेना प्रमुख अपने मुल्क के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री से शक्तिशाली और भारत विरोधी ही होता है। सेना प्रमुख जनरल कयानी हों या राहिल शरीफ, सभी भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। राहिल शरीफ तो खासतौर से भारत के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी के लिए बदनाम थे। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब पाकिस्तान दौरे पर थीं, तब भी राहिल युद्ध की सूरत में भारत को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे रहे थे। राहिल शरीफ ने कहा था, ''हमारी सेना हर तरह के हमले के लिए तैयार है। अगर भारत ने छोटा या बड़ा किसी तरह का हमला कर जंग छेड़ने की कोशिश की तो हम मुंहतोड़ जवाब देंगे और उन्हें ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई मुश्किल होगी।'' यानी उन्हें कूटनीति की कोई समझ नहीं थी। भारत के साथ 1965 के युद्ध में राहिल के चाचा और 1971 के युद्ध में उनके बड़े भाई मारे गए थे। उनके भाई पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथी थे। बीते कुछ समय से भारत-पाक के खराब संबंधों के लिए राहिल शरीफ भी कम जिम्मेदार नहीं थे। वे उसी फौज की नुमाइंदगी कर रहे थे, जिसका मकसद ही भारत का विरोध करना है। पाकिस्तानी सेना का एकमात्र मकसद भारत को हर लिहाज से नुकसान पहुंचाना है। इसलिए चाहे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ हों या कोई और, हालात सुधरने वाले नहीं हैं, क्योंकि सेना पर किसी का जोर नहीं है।