खबर की परख में चूकती पत्रकारिता
   दिनांक 14-मई-2018
समाचारों को अपने निहित स्वार्थ के तराजू पर तोलने वाला मीडिया पत्रकारिता जगत के लिए अनुचित
 
 
 
किसी गंभीर विषय को कैसे सड़कछाप बहस में बदला जाए यह भारत के सेकुलर मीडिया से सीखना चाहिए। उसके लिए जनता के टैक्स से चलने वाले एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में पाकिस्तान को बनाने वाले जिन्ना की तस्वीर लगी होने से बड़ी चिंता की बात इसके समर्थन में दी जा रही दलीलें हैं। विभाजनकारी सोच को मीडिया मंच उपलब्ध करा रहा है। स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में वामपंथी इतिहासकारों के गढ़े झूठ को फैलाने में मीडिया ने भरपूर सहायता की। जिन्ना के समर्थन में 10-15 कथित छात्रों ने दिल्ली में उत्तर प्रदेश भवन के बाहर प्रदर्शन किया, लेकिन इसे मीडिया ने भरपूर प्रचारित किया।
 
प्रोफेसर से आतंकवादी बने मोहम्मद रफी बट्ट की मौत पर मीडिया के एक कुख्यात वर्ग ने अपने तरीके से मातम मनाया। न्यूज पोर्टल ‘द क्विंट’ ने इस आतंकवादी को ‘अच्छा आदमी’ और ‘मृदुभाषी’ बताया। एनडीटीवी ने दुख भरी भाषा में लिखा कि ‘एक आतंकवादी के तौर पर उसका करियर सिर्फ 36 घंटे ही चल पाया’। ‘द क्विंट’ जिसके मालिकों की जड़ें आपातकालीन अत्याचारों तक जाती हैं, मयार्दा की सारी हदें लांघ चुका है। इसी संस्थान ने कुछ दिन पहले एक फर्जी खबर पोस्ट की थी कि कुलभूषण जाधव रॉ का जासूस था। तमिलनाडु से कश्मीर घूमने गए एक नौजवान को पत्थरबाजों ने मार डाला। इस खबर पर सोशल मीडिया पर तो बहुत प्रतिक्रिया देखने को मिली, लेकिन तथाकथित सेकुलर मीडिया ने इसे ‘मामूली घटना’ बताकर खारिज करने की कोशिश की। टाइम्स आॅफ इंडिया ने बताया कि इयरफोन लगाने के कारण वह पत्थरबाजी का शिकार हो गया। उधर कर्नाटक चुनाव से पहले कांग्रेस के अनैतिक गठबंधनों की पोल मीडिया के जरिए ही सामने आ रही है। टाइम्स नाऊ ने खुलासा किया कि जिहादी संगठन पीएफआई और कांग्रेस के बीच साठगांठ है। इसी तरह बेंगलुरु में कांग्रेसी उम्मीदवार को जिताने के लिए हजारों की संख्या में फर्जी वोटर कार्ड पकड़े जाने का मुद्दा भी छाया रहा। कुछ रहस्यमयी कारणों से हिंदी चैनलों ने इन खबरों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसा क्यों हुआ होगा। मुख्यधारा मीडिया की चालाकियों को लोग अब समझने लगे हैं। बीते हफ्ते सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने एक ऐसे लड़के की पहचान की, जो खासतौर पर एनडीटीवी और आजतक चैनल की बहसों में आम नागरिक बनकर बैठता है। पता चला कि वह कांग्रेस पार्टी के लिए काम करता है। दर्शकों की भीड़ में से उसे सवाल पूछने का मौका जरूर दिया जाता था। ये एक तरह की ‘फिक्सिंग’ है जिसमें किसी मुद्दे पर जनता की राय के बहाने एक खास तरह की राय को थोपा जाता है ताकि जनमत को प्रभावित किया जा सके।
 
पीटीआई ने सूचना के अधिकार के तहत बीते 5 साल में बैंकों में हुए घोटालों के बारे में जानकारी मांगी थी। जो जानकारी मिली उसके आधार पर रिपोर्ट दी कि देश में बीते 5 साल में एक लाख करोड़ के बैंक घोटाले सामने आए हैं। इस आधार पर लगभग सभी अखबारों ने खबरें छापीं, जिनका मतलब यह निकलता है कि केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद भी बैंकों में घोटाले जारी हैं। लेकिन यह बात बहुत सफाई से छिपा ली गई थी कि जो घोटाले पकड़े गए हैं वे सभी 2014 के पहले के हैं। मोदी सरकार की सख्ती के कारण वे सतह पर आए, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई चल रही है। पर इस सचाई को क्यों छिपाया गया, यह जगजाहिर है।
मीडिया के ऐसे वर्ग को आत्ममंथन की जरूरत है जो खबरों की प्रामाणिकता को अपने सेकुलर पैमाने पर तोलने के बाद परोसता है।