विवादों में लिपटी विरासत
   दिनांक 14-मई-2018
अपनी बात-
वही गुणवान प्रशंसनीय है जिसकी वाणी रामद्वेषों का बहिष्कार कर न्यायाधीश के समान भूतकालीन घटनाओं को यथार्थ रूप से प्रस्तुत करती है।
—कल्हण (राजतरंगिणी, 1/7)
  
ऐसे समय जब पूरा देश जज, न्यायपालिका और महाभियोग से जुड़ी पेचीदगियों को बूझने में जुटा था, इतिहास में दबे एक वकील ने अचानक सुर्खियां अपनी ओर खींच लीं। लोग मानो दो पालों में बंट गए। यदि बांटना ही कसौटी है तो जिन्ना के लिए यह पहचान नई नहीं है। मोहम्मद अली जिन्ना यानी नामी बैरिस्टर।
 

 
 
जिन्ना यानी पाकिस्तान का संस्थापक। जिन्ना यानी एक फांस। यह मानने में हर्ज नहीं कि यह फांस आज भी कई लोगों को टीसती है। ये ‘कई लोग’ कौन हैं? निस्संदेह इन लोगों में विभाजन का दंश झेलने वाले लाखों हिन्दू शामिल हैं। इन लोगों में पाकिस्तान के (या कहीं और के भी) वे सुन्नी भी अनकहे शामिल ही हैं जिन्हें जिन्ना द्वारा दी गई विभाजन की दलीलें और अलग इस्लामी मुल्क की बुलंद मांग तो रास आती है मगर उनकी शिया पहचान के खुलासे से जिन्हें असहजता होती है। इन लोगों में वे इतिहासकार भी शामिल हैं जो विभाजन को एक घटना नहीं बल्कि कई घटनाओं, परिस्थितियों और संदर्भों से उपजा परिणाम मानते हैं और इसके लिए किसी ‘एक ’ को नायक या खलनायक के तौर पर जिम्मेदार नहीं मानते। हैरान न हों किन्तु इन लोगों में उन्माद और कट्टरता के वे पैरोकार भी हैं जिन्हें जिन्ना के व्यक्तित्व के कुछ खुले पक्ष उपरोक्त सभी से ज्यादा चुभते हैं, और वे इन बातों पर कभी चर्चा भी नहीं करना चाहते। दिलचस्प बात यह है कि उपरोक्त सभी की टीस अपनी-अपनी जगह सही है। पाकिस्तान से अपनी संपत्ति और संबंधों की पूंजी लुटाकर किसी तरह जान बचाकर भारत आए लोगों की कहानियां और उन कहानियों में ‘जिन्ना’ हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं। अब जिन्ना से जुड़ी कुछ दबी या अल्पज्ञात बातों का जिक्र।
 
— 16 अगस्त सन् 1946 में बंगाल और खासकर कोलकाता में हुआ भारी हिन्दू नरसंहार ज्यादातर की स्मृतियों में उस भयानकता के साथ नहीं कौंधता जितना कि तब उसे लोगों ने अनुभव किया था। (यह ताप तब ऐसा था कि तब नोआखली में गांधी जी को भी पीड़ित हिन्दुओं की खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी थी।) मोहम्मद अली जिन्ना के आह्वान पर और उसके खास हुसैन सुहरावर्दी की साफ दिखाई देने वाली शह इस दंगे के केंद्र में थी। छह दिन चले इस नरसंहार में हजारों लोग मरे और लाखों बेघर हुए।
 
— इससे भी ज्यादा अचर्चित टीस जिन्ना की पहचान से जुड़ी है जिसे आप ‘सुन्नी कसक ’ कह सकते हैं। पाकिस्तान के इतिहासकार मुबारक अली ने इसका जो ब्यौरा दिया उससे जिन्ना पर दावेदारी को लेकर उसकी मृत्यु के समय झगड़े की स्थिति का चित्र उभरता है। उनके अनुसार, ‘‘दफ्न के समय मुस्लिम लीग से जुड़े शब्बीर अहमद उस्मानी नामक एक मौलवी जिद पर अड़े थे कि आखिरी रस्में सुन्नी तौर-तरीकों से होनी चाहिए। इस पर खूब विवाद हुआ और बाद में शिया-सुन्नी, दोनों तौर तरीकों से काम निपटाया गया। शिया जिन्ना पर सुन्नी हक की बेकरारी पर बात खत्म नहीं होती। क्योंकि इससे ज्यादा पोशीदा बात यह है कि शिया होने से पहले जिन्ना इस्माइली मुसलमान थे। जाहिर है, 6 इमामों को मानने वाले इस्माइलियों को 12 इमामों को मानने वाले जिन्ना के व्यक्तित्व की यह छिपी सचाई कचोटती है। विभाजन के लिए केवल जिन्ना को ‘क्रेडिट’ देने की बात भारत-पाकिस्तान में कुछ लोगों को सुहाती हो तो उन्हें विभिन्न इतिहासकारों का आकलन और विकीपीडिया की एक पंक्ति (...गौरतलब है कि पाकिस्तान और भारत का बंटवारा जिन्ना और नेहरू के राजनीतिक लालच की वजह से हुआ) टीस दे सकती है।
 
— लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद कायदे-आजम कहलाने वाले, अलग इस्लामी मुल्क के संस्थापक सबसे ज्यादा किसी को चुभते हैं तो इस्लामी कट्टरता को। यह सच है कि अलग देश के उग्र-हिंसक आग्रह के बावजूद मोहम्मद अली जिन्ना के जीवन में ऐसा खुलापन था जिनकी कल्पना भी आज के इस्लामी अतिवादियों के लिए ‘कुफ्र’ से कम नहीं है। वामपंथी इतिहासकार हरबंस मुखिया के खींचे चित्र में तब के जिन्ना और आज के पाकिस्तान को रखकर देखिए तो अंदाजा हो जाएगा। बकौल मुखिया, ‘‘जिन्ना ने कभी कुरान नहीं पढ़ा। वो शराब पीते थे, सिगार पीते थे और सूअर का मांस खाते थे। वे वैसे भी रहन-सहन में मुस्लिम नहीं थे लेकिन नेता मुसलमानों के थे।’’ 
 
तो बहरहाल, जिन्ना के जीवन के अलग-अलग पहलू इतिहास में दबे हैं। दबी चीजों को कुरेदने से दर्द ताजा भी हो जाते हैं। जिन्ना विवाद की सुर्खियां दर्द के इन्हीं अनकहे किस्सों का बाहर आना है।
 
मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की स्थापना और मुसलमानों की अलग यूनिवर्सिटी वाला रूमानी ‘अलगाव’ जिन लोगों को जिन्ना से जोड़ता है, उन लोगों को पोर्क चबाते और स्कॉच के घूंट भरते उस शिया की कल्पना बुरी तरह झकझोरती है जो एक सुन्नी मुल्क का ‘बाबा-ए-कौम’ है। जिन्ना का जिक्र ऐसा ही है। जिन्हें तस्वीरें अपने सीने से सटाए रखनी हैं उन्हें खून, आंसू, और लाखों लोंगों की बद्दुआओं में लिथड़ी यह तस्वीर समग्रता के साथ गले लगानी होगी।