‘‘बेहतर कल के लिए अपना आज कुर्बान कर रहे बलूच’’
   दिनांक 04-मई-2018
बलूचिस्तान में पाकिस्तान के बढ़ते अत्याचारों के बीच वहां के एक बड़े स्थानीय छात्र नेता हमारे संपर्क में आए। उन्होंने बलूचिस्तान की समस्या, वहां के समाज की छटपटाहट तथा समाधान और हर पहलू पर खुलकर बात रखी। उनकी जान को पाकिस्तानी सेना और बलूचिस्तान में जुल्म का पर्याय बनी फ्रंटियर कॉर्प्स की ओर से गंभीर खतरा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हम इस छात्र नेता की पहचान को उजागर नहीं कर रहे। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शरण ने उनसे बातचीत की जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं




पाकिस्तान सेना द्वारा ढाए जा रहे जुल्म की बातें अक्सर सामने आती हैं। बलूचिस्तान में पाकिस्तान जो कुछ भी कर रहा है, उसे स्थानीय छात्र किस नजरिये से देखते हैं?
सबसे पहले तो इस मुद्दे पर हमारी राय जानने की कोशिश करने के लिए शुक्रिया। यह सवाल एक गुलाम मुल्क के जांबाज नौजवानों से जुड़ा है। कहते हैं कि अगर किसी समाज की नब्ज पकड़नी हो तो यह जानना चाहिए कि वहां का नौजवान क्या सोचता है। हमारे यहां नौजवान, खास तौर पर छात्रों में मायूसी है और उससे भी कहीं ज्यादा आक्रोश। वे अपने समाज और मुल्क के कल को लेकर फिक्रमंद हैं। बेहतर कल के लिए वे अपना आज कुर्बान कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि आने वाली नस्लों को वह सब न देखना पड़े जो उन्हें देखना पड़ रहा है। पाकिस्तानी फौज जुल्म करने से बाज नहीं आ रही और हम अपने-अपने तरीके से इनकी मुखालफत नहीं छोड़ रहे।
दरअसल, यहां जीना-पढ़ना-सीखना, कुछ भी आसान नहीं है। एक बलूच परिवार में पैदा होने के साथ ही हमारी मुश्किलें शुरू हो जाती हैं। पढ़ाई के लिए स्कूल-कॉलेज जाना किसी जंग से कम नहीं है, क्योंकि गरीबी इतनी है कि हमें हर रोज खुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद करनी पड़ती है। पाकिस्तानी फौज की हैवानियत इतनी कि कोई घर ऐसा नहीं जिसमें जुल्म के निशान न हों। ऐसे में तालीम हासिल करने का जज्बा बचाए रखना आसान नहीं होता। दो लफ्जों में कहूं तो हम छात्र एक ऐसे गुलाम मुल्क के बाशिंदे हैं जो नाउम्मीदी के इस आलम में भी कल सब दुरुस्त हो जाने की उम्मीद में जिए जा रहे हैं। पाकिस्तानी सेना ने 27 मार्च, 1948 को हमारी जमीन पर जबरन कब्जा किया और तभी से बलूच दोजख की जिंदगी जी रहे हैं। उनके लिए बलूचिस्तान एक कॉलोनी की तरह है और यहां वही सब हो रहा है जो एक गुलाम समाज के खिलाफ होता है। आज बलूचिस्तान में सामाजिक-राजनीतिक नजरिये से खतरनाक हालात हैं।

शिक्षा के माहौल पर क्या कहेंगे?
जैसा मैंने कहा, यहां तालीम का माहौल नहीं है। जो तालीम दी भी जा रही है, उसमें हमारी रवायतों के लिए कोई जगह नहीं है। न बोली अपनी, न जुबान। बलूची या ब्राह्वी की कहीं कोई पढ़ाई नहीं। सब अंग्रेजी, उर्दू या फिर अरबी में है। बाहरी दुनिया के लोग सोच भी नहीं सकते कि यहां हमें रोजाना कैसे हालात से गुजरना पड़ता है। हम जब इस मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं तो दूसरी ओर हमारे लोगों के खिलाफ फौजी आॅपरेशन चल रहा है।

बलूचिस्तान में लोगों का ‘लापता’ हो जाना आम बात है। क्या छात्रों के साथ भी ऐसा हो रहा है? ऐसी कुछ हालिया घटनाएं? आखिर यह सब क्यों हो रहा है?

सबसे पहले यह समझिए कि यह जमीन हमारी है और खुदा ने हमें बेहिसाब कुदरती खजाने से नवाजा है। इसका फायदा पाकिस्तान उठा रहा है और हम लोग निहायत जरूरी चीजों से भी महरूम हैं। वे हमें न तालीम देंगे, न बीमार हो जाने पर इलाज। और हम पर ये सोचकर जुल्म भी करेंगे कि हमारी आवाज न निकले? इस वजह से पूरे बलूचिस्तान में आक्रोश है। यही आक्रोश हम छात्रों में भी है। जुल्म के जवाब में आक्रोश और फिर आक्रोश के इजहार के जवाब में और भी ज्यादा जुल्म... बलूचिस्तान में सिर्फ और सिर्फ यही हो रहा है। अब तक हमारे कितने साथी छात्र उठा लिए गए या मार दिए गए, इसका कोई हिसाब नहीं है। ये सब दिन की रोशनी में होता है, उनमें गलत करने का न तो अहसास है और न ही खुदा का कोई खौफ। पाकिस्तानी फौज जिन्हें उठा ले जाती है, उनमें से बहुतों का कभी पता नहीं चलता। कुछ लोग सड़ी-गली लाश की शक्ल में इधर-उधर मिल जाते हैं, जिनके शरीर पर बेहिसाब जुल्म के निशान होते हैं। ऐसे लोगों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, लेकिन कुछ के नाम हैं- शाहिद बलोच, बीएसओ आजाद के महासचिव रजा जहांगीर, संगत सना बलोच, आगा आबिद शाह, शफी बलोच, इलियास नजर, फरीद बलोच, सिराज बलोच, कुमार बलोच, माजिद बलोच वगैरह।
पिछले साल 15 नवंबर को छात्र नेता सनाउल्लाह बलोच, नासिर बलोच, हसन बलोच और रफीक बलोच को पाकिस्तानी सेना ने उठा लिया। तुरबत जिले के टम्प इलाके से तारिक बलोच, अब्दुल समद, जफर नजरानी वगैरह को फौज उठा ले गई। बलूचिस्तान के बाहर रह रहे बलूचों के साथ भी फौज और हुकूमत दहशतगर्द मानकर सलूक करती है। गौर कीजिए, आफताब बलोच, उलफत बलोच, फरीद बलोच, इलियास बलोच वगैरह को तो कराची से उठा ले गए। देखिए, इस तरह गायब कर दिए छात्र इतने हैं कि जुबान थक जाए, पर फेहरिस्त खत्म न हो। फौज चाहती है कि बलूचों में खौफ का माहौल बने, जिससे वे उनके खिलाफ आवाज उठाना छोड़ दें और सामाजिक-राजनीतिक हक की बात न करें। उन्हें पता है कि अगर बलूच अपने हक के लिए एक साथ उठ खड़े हुए तो उनके लिए मुसीबत हो जाएगी और उन्हें सबसे ज्यादा खतरा हम नौजवानों से है। इसलिए वे हर उस तरीके को आजमा रहे हैं जिससे हमारा हौसला टूटता हो। यहां के स्कूल-कॉलेज फौजी कैम्प हो गए हैं। काश! आप आकर देख पाते कि यहां क्या हो रहा है। फौज किस तरह के आॅपरेशन चला रही है? कैसे लोगों को उठा लिया जाता है? कैसे किसी इलाके को घेरकर जमीनी और हवाई हमले किए जाते हैं?

सीपीईसी (चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) को आप कैसे देखते हैं?
सबसे पहली बात, पाकिस्तान और चीन की यह परियोजना निहायत गैरकानूनी है। यह हमारे कुदरती संसाधनों को हमसे छीनने की साजिश है और इसकी वजह से हमें हमारी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। जबसे अरबों डॉलर की यह परियोजना शुरू हुई है, पाकिस्तानी फौज हमसे यह इलाका जबरन खाली कराने में जुट गई और यह सिलसिला आज भी चल रहा है। ग्वादर में भी ऐसा ही हो रहा है। बंदरगाह परियोजना की वजह से वहां रहने वाले हजारों लोगों को हटा दिया गया। एक ओर इसे एक बेहतरीन बंदरगाह बनाया जा रहा है, दूसरी ओर वहां के बाशिंदे पीने के पानी से भी महरूम हैं। इस परियोजना में चीन अपना फायदा देख रहा है, इसीलिए मोटा पैसा लगा रहा है। चीन दुनिया को यह बताकर अपनी ताकत का दिखावा भी करना चाह रहा है कि इस बंदरगाह का वह जब चाहे फौजी इस्तेमाल भी कर सकता है। एक ऐसा मुल्क जो पूरे दक्षिण एशिया इलाके के लिए खतरा और पूरी दुनिया में दहशतगर्दी का सबब बन गया है, इस परियोजना के बूते अपनी माली हालत को दुरुस्त करना चाहता है। लेकिन मैं पूरे भरोसे के साथ कहता हूं कि सीपीईसी कभी भी मुकम्मल नहीं हो सकेगा, क्योंकि यह हम बलूचों की चाहत के खिलाफ है। हम अमनपसंद कौम हैं और अमन के लिए कुर्बान होना जानते हैं। हमने अपनी जमीन पर ऐसी ताकतों को नहीं पनपने दिया जो दुनिया में अमन के लिए खतरा हों। हम आगे भी ऐसा करते रहेंगे, चाहे इसके लिए जान भी देनी पड़ जाए। आज दुनिया में अमन के लिए पाकिस्तान और चीन बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। एक गुनहगार है तो दूसरा उसका सरपरस्त। खतरा तो दोनों से है।

बलूचिस्तान प्रांत की सरकार को आप कैसे देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि इसमें शामिल होकर बलूच अपने हक की बात न सिर्फ जोर देकर कह सकते हैं, बल्कि वैधानिक उपाय भी कर सकते हैं?
आप किस सरकार की बात कर रहे हैं? बलूचिस्तान में अगर वाकई सरकार चल रही होती तो बलूचों के खिलाफ यही सब होता? यह पाकिस्तानी हुकूमत की कठपुतली है। पूरा का पूरा ड्रामा है। बलूचिस्तान में पाकिस्तानी जुल्म में यहां की सियासी पार्टियां बराबर की हिस्सेदार हैं। पाकिस्तान इन्हें हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है और इन लोगों ने खुद को हुकूमत की खिदमत में पेश कर रखा है। हम पर हो रहे जुल्म में ये सभी शरीक हैं। इसलिए बलूचों ने ऐसी दिखावटी सियासी पेशबंदी का हिस्सा न बनने का फैसला किया। जरा सोचिए। हमारा कत्लेआम हो रहा है। पाकिस्तानी फौज हम पर जुल्म कर रही है। हमारी औरतों के साथ बुरा सलूक किया जा रहा है। बच्चों तक को नहीं बख्शा जा रहा है। जिस तंत्र में हमारी कौम को ही खत्म करने के बीज पड़े हों और उसे पानी दिया जा रहा हो, उसमें हम भला कैसे शरीक हो सकते हैं? इस्लामाबाद की हुकूमत जो चाहती है, कर लेती है। 2013 के चुनाव को देख लें। इसमें बलूचों ने भाग नहीं लिया था। पाकिस्तान ने बलूचों की नुमाइंदगी के नाम पर गंदा खेल खेला और डॉ. मलिक बलोच, सनाउल्लाह जेहरी और फिर अब्दुल कदूस बेजैन्जो को चुना गया। सरकार ने इनका इस्तेमाल टिश्यू पेपर की तरह करने के बाद इन्हें हाशिए पर डाल दिया। क्या बलूच ऐसे सलूक के हकदार हैं? क्या हमें ऐसे तंत्र का हिस्सा होना चाहिए? बेशक स्कूली तालीम में हम पीछे हों, लेकिन मैं पूरे इत्मीनान के साथ कह सकता हूं कि एक इनसान के इनसान के लिए फर्ज की तालीम हमने आंखें खोलने के साथ ही पाई है। बलूचों को गैरत के साथ जीने और खुदमुख्तार होने का हक है। ये हमारी जमीन है, इसके बारे में फैसला हम नहीं तो कौन करेगा?