महाभियोग नहीं इसे राजनीतिक महाभियोग कहें महाभियोग नहीं इसे राजनीतिक महाभियोग कहें
महाभियोग नहीं इसे राजनीतिक महाभियोग कहें
   दिनांक 07-मई-2018
 
12 जनवरी, 2018 को नई दिल्ली में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में चार वरिष्ठ न्यायाधीश। इसके बाद कांग्रेस और वामपंथी दल मुद्दा ले उड़े और शीर्ष अदालत के एक रास न आने वाले फैसले के बाद मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग चलाने की बात चलाई गई

राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को पद से हटाने के लिए कांग्रेस और चंद विपक्षी दलों के सदस्यों के आवेदन को अस्वीकार कर न्यायपालिका की गरिमा और उसकी विश्वसनीयता को अक्षुण्ण रखकर भारतीय लोकतंत्र में एक मील का पत्थर कायम किया है। देश के इतिहास में यह पहला अवसर था जब मुख्य न्यायाधीश को उनके पद से हटाने के लिए राजनीतिक दलों ने यह कदम उठाया था। यही नहीं, यह आवेदन देने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम कार्य दिवस से ठीक पहले कांग्रेस ने मुख्य न्यायाधीश को यह प्रकरण लंबित होने के दौरान अपने प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों से दूर रहने की मांग कर अपनी मंशा जाहिर कर दी थी।

मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग खारिज करने का निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया गया। पूरी प्रक्रिया पर एक महीने से मंथन चल रहा था। वैसे भी राज्यसभा के सभापति का कार्यालय कोई डाकघर नहीं है, जो केवल आगे बढ़ा दे। यह एक संवैधानिक संस्था है और जिम्मेदारी से कार्य करता है।
—एम. वेंकैया नायडू, सभापति, राज्यसभा

राज्यसभा के सभार्पित का निर्णय असंवैधानिक और गैर-कानूनी है। किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले उन्हें कम से कम कॉलेजियम से ही परामर्श कर लेना चाहिए।
— कपिल सिब्बल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता

इस मांग से संकेत साफ थे कि न्यायमूर्ति दीपक मिश्र अपनी प्रशासनिक और न्यायिक जिम्मेदारियां छोड़ेंगे तो विपक्ष यह जिम्मेदारी दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही सौंपे जाने की उम्मीद लगाए था। परंतु सवाल यह है कि मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाने वाले चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों में से क्रमवार भी क्या वर्तमान परिस्थिति में यह जिम्मेदारी सौंपना उचित होता? शायद यह भी एक वजह थी कि सभापति को विधिवेत्ताओं और संविधान विशेषज्ञों से परामर्श करके इस आवेदन के बारे में निर्णय लेने पर बाध्य होना पड़ा।
इस मामले में राज्यसभा के सभापति ने प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए विस्तार से विमर्श करने और कानूनी प्रावधान तथा सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था के अध्ययन के बाद इस आवेदन को निरस्त करने की 22 वजह बताते हुए 10 पृष्ठ का अपना विस्तृत फैसला सुनाया। नायडू ने इस आवेदन में लगाए गए आरोपों को मुख्य न्यायाधीश को पद से हटाने की कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त पाया, क्योंकि आरोपों के साथ कोई ठोस तथ्य और सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई थी।
जहां तक कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों का यह तर्क है कि इससे न्यायपालिका की गरिमा कम हुई तो यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि संभवत: सबसे पहले इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ही आपातकाल के दौरान न्यायपालिका को कमजोर करने या उसे घुटने के बल झुकाने का जो सिलसिला शुरू किया था, वह आज भी इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

हलाला पर मुस्लिम महिलाओं को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का है इंतजार, पर कांग्रेस इसमें बाधा डालना चाहती है
कांग्रेस सरकार ने जनवरी, 1977 में सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया था। उसी कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को पद से हटाने के लिए एक नया हथकंडा अपनाया। इस बार, उसने शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ मुख्य न्यायाधीश के सार्वजनिक हुए मतभेदों को अपना हथियार बनाया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस और उसका साथ दे रहे विपक्षी दलों के इस कदम से न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता तार-तार होगी।

प्रस्तावित श्रीराम मंदिर
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद कपिल सिब्बल विपक्ष के आवेदन को अस्वीकार करने के सभापति के फैसले को असंवैधानिक और गैरकानूनी बताते हैं। उनका कहना था कि किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले सभापति वेंकैया नायडू को कम से कम कॉलेजियम से ही परामर्श कर लेना चाहिए था। मतलब साफ है कि मुख्य न्यायाधीश को पद से हटाने के प्रस्ताव के आवेदन पर सभापति को न्यायमूर्ति चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ से परामर्श करना चाहिए था। ये चारों वही वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं, जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली के खिलाफ बगावत करने जैसा कदम उठाया था।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्र
 
विपक्षी दलों को आशंका है कि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश अयोध्या मामले पर कुछ निर्णय दे सकते हैं, जिससे भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में लाभ हो सकता है। यही उनकी छटपटाहट है। इसलिए वे लोग मुख्य न्यायाधीश को किसी भी मामले की सुनवाई से रोकने के लिए साजिश रच रहे हैं। यह महाभियोग भी उसी का हिस्सा है। वे नहीं चाहते थे कि न्यायमूर्ति दीपक मिश्र अयोध्या जैसे मामलों की सुनवाई को आगे बढ़ाएं।

इस सारे घटनाक्रम को देखते हुए यह सवाल उठता है कि कहीं इस कवायद का मकसद किसी न किसी तरह न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के खिलाफ बगावत करने वाले न्यायाधीशों का नेतृत्व कर रहे न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर को, जो 22 जून को सेवानिवृत्त होंगे, किसी तरह मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों की जिम्मेदारी दिलाकर कुछ संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुकदमों को अपनी सुविधानुसार इधर-उधर कराना था?
बहरहाल, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को पद से हटाने के लिए बनाई गई अपनी रणनीति में बुरी तरह विफल हो गए हैं। अब देखना यह है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चे की अगुआई करने वाले वकील कपिल सिब्बल और दूसरे अधिवक्ता मुख्य न्यायाधीश के न्यायालय में सूचीबद्ध होने वाले मुकदमों में हाजिर होंगे या फिर उनके सेवानिवृत्त होने का इंतजार करेंगे। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र का कार्यकाल एक अक्तूबर,2018 तक है।
भले ही आज कांग्रेस नरेंद्र मोदी सरकार पर न्यायपालिका को कमजोर करने या अपने अनुरूप चलाने के आरोप लगा रही हो लेकिन इस सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कांग्रेस ने ही न्यायपालिका को राजनीति की ओर धकेला और उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाई।
 
पहली नजर में इसका उद्देश्य यही लगता है कि कांग्रेस और वामपंथी दल नहीं चाहते कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले अयोध्या प्रकरण पर शीर्ष अदालत अपना फैसला सुनाए। उल्लेखनीय है कि इस प्रकरण की सुनवाई शुरू होने पर मुस्लिम पक्षकार की ओर से कपिल सिब्बल ने न्यायमूर्ति दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ से स्पष्ट रूप से आग्रह किया था कि 2019 के चुनावों के बाद इस प्रकरण पर सुनवाई कराई जाए।
 
हालांकि इस विशेष पीठ ने कपिल सिब्बल का अनुरोध अस्वीकार कर दिया था, लेकिन इस समय एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन भी अप्रत्यक्ष रूप से इसी तर्क को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि निकाह, हलाला और बहुविवाह की कुरीति के खिलाफ दायर याचिकाओं पर विचार करने से पहले अयोध्या प्रकरण में शीर्ष अदालत के 1993 के फैसले से उठ रहे सवालों पर संविधान पीठ विचार करे। मतलब साफ है कि किसी न किसी तरह प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष अयोध्या प्रकरण आगे नहीं बढ़ सके।
 
संभव है कि मुख्य न्यायाधीश को हटाने, शीर्ष अदालत की साख को धक्का पहुंचाने की साजिश पहले ही रच ली गई थी। याद कीजिए 12 जनवरी का वह संवाददाता सम्मेलन, जिसे न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने संबोधित किया था। हो सकता है कि इन चारों न्यायाधीशों को इसकी भनक तक न हो और कांग्रेस तथा दूसरे विपक्षी दलों ने उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को अपने राजनीतिक हित के लिए इस्तेमाल कर लिया।
इन न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाया था कि संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुकदमों के आवंटन में मनमानी हो रही है और ऐसे मामले कनिष्ठ पीठ को आवंटित किए जा रहे हैं। न्यायाधीश बी. एच. लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु का मामला भी इसमें से एक था।
 
इस संवाददाता सम्मेलन के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता डी. राजा की न्यायमूर्ति चेलामेश्वर से उनके निवास पर मुलाकात ने अनेक सवालों को जन्म दिया था। न्यायमूर्ति चेलामेश्वर की नाराजगी को पिछले साल नवंबर में हुई एक घटना से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मेडिकल कॉलेज से संबंधित मामला अनुकूल समाधान के लिए कथित रूप से रिश्वत से जुड़ा था। इस संबंध में ओडिशा उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था।
इसे लेकर वकील कामिनी जायसवाल ने सर्वोच्च न्यायालय मेंं याचिका दायर की। चूंकि न्यायमूर्ति मिश्र एक संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे थे, इसलिए यह मामला न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष आया। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे के तर्क सुनने के बाद पीठ ने इसे बहुत ही गंभीर बताते हुए कहा था कि वरिष्ठता के क्रम में पहले पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस पर सुनवाई करेगी।
 
लेकिन एक दिन बाद मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कामिनी जायसवाल की याचिका पर विचार के लिए संविधान पीठ गठित करने का दो न्यायाधीशों की पीठ का आदेश निरस्त कर दिया। संविधान पीठ ने दो सदस्यीय पीठ के आदेश पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कोई भी पीठ मुख्य न्यायाधीश द्वारा मामला आवंटित किए जाने के बगैर कोई मामला नहीं ले सकती, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश ही पीठ का गठन कर सकते हैं।
 
बहरहाल, मुख्य न्यायाधीश को पद से हटाने की मुहिम में कांग्रेस और वाममोर्चा पहले चरण में बुरी तरह मात खा गया है। अब 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले की राजनीतिक बाजीगरी में उसके अगले कदम का इंतजार रहेगा।
राज्य सभा के सभापति के फैसले पर उठाए जा रहे सवालों के मद्देनजर संविधान में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने संबंधी प्रावधानों और न्यायाधीश जांच कानून में निर्धारित प्रक्रिया को समझना जरूरी है।
 
संविधान के अनुच्छेद (124:4) के अनुसार, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन राष्टÑपति के समक्ष उसी सत्र में रखे जाने पर राष्टÑपति ने आदेश नहीं दे दिया है।’’
इसी तरह अनुच्छेद (124:5) में प्रावधान है, ‘‘संसद, खंड:4: के अधीन किसी समावेदन के रखे जाने की तथा न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता की जांच और साबित करने की प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकेगी।’’
न्यायाधीश जांच कानून 1968 के प्रावधानों के अनुसार, किसी भी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव पर राज्यसभा के कम से कम 50 और लोकसभा के मामले में कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। मुख्य न्यायाधीश के मामले में कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने राज्यसभा के सभापति को इस प्रस्ताव का नोटिस दिया था। इसके बाद, सभापति या लोकसभा अध्यक्ष, जैसी भी स्थिति हो, को अपने विवेक से यह निर्णय करना होता है कि क्या यह नोटिस स्वीकार करने योग्य है और क्या इसमें संविधान में प्रदत्त अनिवार्यताओं का पालन किया गया है। किसी न्यायाधीश को साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस मिलने के बाद अगली प्रक्रिया की व्यवस्था न्यायाधीश जांच कानून, 1968 में है।
 
इस कानून की धारा 3 में स्पष्ट प्रावधान है कि इस तरह का नोटिस मिलने पर अध्यक्ष या सभापति, जैसी भी स्थिति हो, ऐसे व्यक्तियों से परामर्श करके, जिन्हें वह उचित समझते हों, और सारी सामग्री, जो उन्हें उपलब्ध कराई गई हो, पर विचार के बाद ऐसा प्रस्ताव स्वीकार कर सकते हैं या इसे स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं। यदि ऐसा प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो इसी धारा के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है। इसके दो अन्य सदस्यों में एक किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दूसरा सदस्य कोई प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होगा।
इसी प्रावधान के अंतर्गत अभी तक ऐसी समिति के अध्यक्ष पद के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने की परंपरा रही है। लेकिन इस मामले में चूंकि मुख्य न्यायाधीश को ही पद से हटाने का मुद्दा है तो सवाल यह भी था कि अब समिति की अध्यक्षता के लिए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के चयन हेतु किससे परामर्श किया जाएगा? क्या दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश जे. चेलामेश्वर, या फिर न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, जो पहले ही मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगा चुके हैं? क्या ऐसा करना न्यायोचित होगा? इस तथ्य पर भी गंभीरता से गौर करने पर नोटिस देने की मंशा स्वत: ही साफ होने लगती है।

नेता बने न्यायाधीश
सबसे पहली घटना असम के बहरूल इस्लाम की है। भारत के इतिहास में वे पहले राजनीतिक व्यक्ति थे जो संसद की सदस्यता से त्यागपत्र देकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने थे। फिर वे सर्वोच्च न्यायालय के भी न्यायाधीश बने और सेवानिवृत्त होने से करीब डेढ़ महीने पहले ही उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था। बहरूल इस्लाम 1962 में राज्यसभा में कांग्रेस के सदस्य थे। उन्होंने राज्यसभा के सदस्य के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के बीच में ही त्यागपत्र दे दिया। उन्हें 1972 में असम और नागालैंड उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। बाद में वे जुलाई, 1979 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी बने। वे एक मार्च, 1980 को सेवानिवृत्त हुए और इसके बाद चार दिसंबर, 1980 को उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया था लेकिन यहां भी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने जनवरी, 1983 में त्यागपत्र दे दिया था।
कांग्रेस के ही एक अन्य नेता विजय बहुगुणा को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। बहुगुणा को पहले उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया और फिर वे मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने, लेकिन अचानक ही उन्होंने 15 फरवरी, 1995 को न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद विजय बहुगुणा कांग्रेस में शामिल हो गए और 2007 से 2012 तक लोकसभा में कांग्रेस के सदस्य रहे और फिर 13 मार्च, 2012 से 31 जनवरी, 2014 तक वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने।

न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र को भी इसी कतार में रखा जा सकता है। वे 25 सितंबर, 1990 से 24 नवंबर, 1991 तक देश के मुख्य न्यायाधीश रहे। सेवानिवृत्ति के बाद वे राष्टÑीय मानवाधिकार आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किए गए, लेकिन यहां से अवकाश ग्रहण करने के बाद उन्हें 1998 में राज्यसभा का सदस्य नामित किया गया था।
इसी तरह 19 जुलाई, 2013 से 26 अप्रैल, 2014 तक देश के 40वें मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति पी सदाशिवम को सेवानिवृत्ति के बाद केरल का राज्यपाल बनाया गया। ऐसा पहली बार हुआ कि किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश को किसी राज्य का राज्यपाल बनाया गया हो।
हालांकि, इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त करने वाली न्यायमूर्ति एम फातिमा बीवी को सेवानिवृत्ति के बाद 25 जनवरी, 1997 को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया था। न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ने राज्यपाल के रूप में राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की मौत की सजा के मामले में दायर दया याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
प्रस्तावों का इतिहास किसी मुख्य न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए राज्यसभा के सभापति को प्रस्ताव का नोटिस तो पहली बार दिया गया, लेकिन इससे पहले भी कई मामलों में न्यायाधीशों को पद से हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा चुका है। इनमें से सिर्फ दो मामले ही संसद तक चर्चा के लिए पहुंचे थे। इनमें से एक लोकसभा में कांग्रेस सदस्यों के सदन में मौजूद रहने के बावजूद मतदान से अनुपस्थित रहने की वजह से पारित नहीं हो सका और दूसरे में राज्यसभा से पारित होने के बाद लोकसभा में इस पर चर्चा से पहले ही न्यायाधीश ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
देश के संसदीय इतिहास में मई, 1993 में पहली बार किसी न्यायाधीश को पद से हटाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए गए थे। लेकिन राजनीतिक समीकरणों की वजह से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी को पद से नहीं हटाया जा सका था क्योंकि उन्हें पद से हटाने के लिए लोकसभा में हुई बहस के बाद मतदान के दौरान सत्तापक्ष की रणनीति की वजह से प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था।
न्यायमूर्ति रामास्वामी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। इस मामले में न्यायमूर्ति रामास्वामी को पद से हटाने की प्रक्रिया के दौरान लोकसभा में बेहद दिलचस्प बहस हुई थी। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो बाद में कांग्रेस सरकार में कानून मंत्री बने, ने लोकसभा के बार से न्यायमूर्ति रामास्वामी का बचाव किया था।
इसके बाद अगस्त, 2011 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें पद से हटाने की कवायद राज्यसभा में शुरू हुई थी। इस मामले में राज्यसभा में न्यायमूर्ति सेन को पद से हटाने के प्रस्ताव पर पूरी बहस हुई। न्यायमूर्ति सेन ने इस बहस में हिस्सा लेते हुए तमाम आरोपों का जवाब भी दिया, लेकिन उन्हेंं पद से हटाने का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया। इसके बाद लोकसभा में प्रस्ताव पर चर्चा होने से पहले ही न्यायमूर्ति सेन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इस तरह वे भी संसदीय प्रक्रिया के बाद पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बच गए थे।
इसी तरह, सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी दिनाकरण को भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से पद से हटाने के लिए राज्यसभा के सभापति को याचिका दी गई थी। इस मामले में आरोप भी निर्धारित हुए लेकिन उन्होंने जुलाई, 2011 में पद से इस्तीफा दे दिया।
इसके अलावा, तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सी. वी. नागार्जुन रेड्डी पर निचली अदालत में एक न्यायाधीश का उत्पीड़न करने और गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे. बी. पादीर्वाला द्वारा अपने एक फैसले में की गई टिप्पणी को लेकर उनके खिलाफ भी राज्यसभा के सभापति के समक्ष महाभियोग याचिका दायर की जा चुकी है। हालांकि न्यायमूर्ति पादीर्वाला ने बाद में इस टिप्पणी को फैसले से हटा दिया।
इसके बाद, न्यायपालिका में ही कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की कथित घटना को लेकर राज्यसभा के सदस्यों ने अप्रैल, 2015 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. के. गंगले को पद से हटाने के लिए सभापति को याचिका दी थी। राज्यसभा के तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी ने याचिका में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए न्यायाधीश जांच आयोग कानून के प्रावधानों के तहत मुख्य न्यायाधीश की सलाह से तीन सदस्यीय समिति गठित की।
यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश आर भानुमति की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी। इस समिति के अन्य सदस्यों में उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मंजुला चेल्लूर (अब सेवानिवृत्त) और वरिष्ठ अधिवक्ता के. के. वेणुगोपाल (अब अटार्नी जनरल) शामिल थे।
इस समिति को न्यायमूर्ति गंगले के खिलाफ चार आरोपों की जांच कर अपनी रपट राज्यसभा को सौंपनी थी। इनमें कदाचार, महिला न्यायाधीश का यौन उत्पीड़न, गैरकानूनी और अनैतिक मांगों के लिए तैयार नहीं होने पर शोषण, और ग्वालियर से सीधी तबादला तथा प्रशासन न्यायाधीश के रूप में दुरुपयोग शामिल थे। समिति को ये आरोप संदेह से परे सही नहीं मिले। हां, न्यायाधीश के तबादले के संबंध में समिति ने कहा कि महिला न्यायाधीश का उनके पुत्र के 12वीं कक्षा के सत्र के बीच में ही सिर्फ जिला न्यायाधीश की सिफारिश पर ऐसा करना न्यायोचित नहीं था।